“रीमा! तुमसे कितनी बार कहा है कि खर्चे पर थोड़ा ध्यान दो। हर हफ्ते ऑनलाइन शॉपिंग कर लेती हो। इस महीने का बजट पहले ही बिगड़ चुका है।”
रोहित ने ऑफिस से लौटते ही थोड़ा नाराज़ होकर कहा।
“बस, एक ही ड्रेस ली थी। वो भी ऑफिस पार्टी के लिए। और वैसे भी, मैं तो अपनी सैलरी से खरीदती हूं, तुम्हें क्यों बुरा लग रहा है?”
रीमा ने तुनकते हुए कहा।
“रीमा, तुम्हारी सैलरी तो हर महीने आती है, लेकिन महीने के आखिर तक पता ही नहीं चलता कि वो जाती कहाँ है। EMI, किराया, बिजली का बिल — सब मैं देता हूं। तुमसे कभी मांगा क्या? बस इतना कह रहा हूं कि मिलकर थोड़ा हिसाब रखें ताकि बचत हो सके।”
“मुझे हिसाब किताब पसंद नहीं है, रोहित। ज़िंदगी एक बार मिलती है, हर चीज़ सोच-समझकर खर्च करने में मज़ा नहीं आता।”
रीमा ने कंधे उचका कर कहा।
“पर हम दोनों मिलकर घर चला रहे हैं। अगर दोनों में से कोई एक भी ज़िम्मेदारी से ना चले तो मुश्किल होगी।”
रीमा अब चिढ़ गई —
“तो मतलब मैं गैरज़िम्मेदार हूं? शादी से पहले तो बड़े प्यार से कहते थे कि ‘रीमा, तुम जैसी हो, वैसी ही रहना’। अब वही मैं हूं तो तुम्हें तकलीफ़ हो रही है।”
रोहित ने गहरी सांस ली, कुछ नहीं कहा। बस कमरे से बाहर चला गया।
अगले दिन..
रीमा ने अपनी सहेली साक्षी से बात की —
“सुन, मेरा पति तो बहुत बोरिंग है। हर चीज़ का हिसाब रखता है। मैं थक गई हूं।”
साक्षी हँसते हुए बोली,
“अरे छोड़ ना! तेरा पति तो फिर भी अच्छा है। मेरा तो हर खर्चे की स्लिप रखवाता है। चल, शॉपिंग चलें, मूड फ्रेश हो जाएगा।”
रीमा मान गई। दोनों ने खूब शॉपिंग की। कार्ड स्वाइप हुआ और पैसे कट गए। लेकिन महीने के आखिर में जब अकाउंट देखा, तो रीमा घबरा गई।
बिजली और फोन का बिल बाकी था, और जेब खाली।
उसी रात..
रोहित घर आया तो देखा, घर में अंधेरा था।
“बिजली गई क्या?”
रीमा बोली —
“हाँ, बिल भरना भूल गई थी।”
“रीमा! ये कोई भूलने की बात है? मैंने दो दिन पहले ही कहा था कि आखिरी तारीख़ है। अब लेट फीस लगेगी। और अगले महीने फिर टाइट हो जाएगा।”
रीमा की आंखों में आँसू आ गए,
“तुम्हें बस डांटना आता है। कभी प्यार से भी बात नहीं करते।”
रोहित ने धीरे से कहा,
“मैं प्यार से ही बात करना चाहता हूं, पर जब हर बार वही गलती दोहराई जाती है, तो बात डांट में बदल जाती है।”
रीमा चुप रही, पर मन में रोष था।
उसने गुस्से में अपना फोन उठाया और अपनी मम्मी को कॉल किया —
“मम्मी, अब मुझसे नहीं होता। हर बात पर हिसाब, हर खर्च पर सवाल। मैं तंग आ गई हूं।”
रीमा की मम्मी ने तुरंत कहा,
“बेटा, रोहित को समझाओ। अगर न समझे तो कुछ दिन के लिए घर आ जाओ।”
अगले दिन..
रीमा अपना सामान पैक करने लगी।
रोहित ने देखा, पूछा भी नहीं। बस बोला,
“अगर जाना है, तो ठीक है। पर एक बात याद रखना — रिश्ते भागने से नहीं, बैठकर बात करने से बचते हैं।”
रीमा बिना जवाब दिए निकल गई।
मायके में..
रीमा की मम्मी, पापा और छोटी बहन सभी हैरान थे।
पापा ने पूछा —
“क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है?”
रीमा ने कहा,
“पापा, वो मुझसे हर चीज़ का हिसाब मांगता है। जैसे मैं कोई छोटी बच्ची हूं।”
रीमा के पापा बोले —
“बेटा, पति-पत्नी दोनों का फर्ज़ होता है कि घर का खर्चा संभाले। रोहित ने अगर पूछा तो गलत क्या किया? वो तुम्हारा दुश्मन नहीं है।”
रीमा बोली —
“पर पापा, आपको तो कभी मम्मी से हिसाब मांगते नहीं देखा।”
मुस्कुराते हुए पापा बोले —
“क्योंकि तुम्हारी मम्मी खुद बताती है। उसने घर की ज़िम्मेदारी समझी है। हिसाब मांगना नहीं, मिलकर चलना जरूरी है।”
रीमा को अब थोड़ी शर्म आई।
मां ने कहा —
“रिश्ता वही टिकता है, जिसमें ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ होता है। तुम दोनों एक टीम हो, विरोधी नहीं।”
रीमा सोच में पड़ गई।
तीन दिन बाद..
रीमा वापस रोहित के घर आई।
दरवाज़ा खोला तो रोहित चौंक गया।
“तुम आ गई?”
“हाँ,” रीमा ने सिर झुकाते हुए कहा, “मुझे एहसास हो गया कि मैं गलत थी। हिसाब मांगना बुरा नहीं होता, ज़िम्मेदारी दिखाना होता है। मैं अब सब कुछ मिलकर संभालूंगी।”
रोहित मुस्कुराया,
“बस यही तो चाहता था। हम दोनों साथ चलें, लड़ें नहीं। पैसा तो जाएगा, पर भरोसा नहीं जाना चाहिए।”
रीमा ने कहा,
“और अगर फिर कभी मैं ज़्यादा खर्च कर दूं, तो डांटना नहीं, बस समझाना।”
दोनों मुस्कुराए।
कौशल्या जी, यानी रोहित की माँ, दरवाज़े से सब सुन रही थीं।
आँखों में खुशी के आँसू थे —
क्योंकि उन्होंने देखा था कि एक समझदार बेटी की तरह रीमा ने अब घर संभालना सीख लिया था।
सीख:
> रिश्ते तभी टिकते हैं जब दोनों एक-दूसरे को “गलत” नहीं, “कमज़ोर” समझकर संभालते हैं।
हिसाब मांगना नहीं, घर चलाना सीखना — यही असली समझदारी है।