रात के नौ बज चुके थे। सारा घर शांत था, बस रसोई से बर्तनों की खनक सुनाई दे रही थी।
नीलम ने गैस बंद की और थकी हुई आँखों से घड़ी की तरफ देखा।
दिनभर का काम, बच्चों की पढ़ाई, सास के दवाइयाँ, और अब रात का खाना — सब खत्म करके उसने गहरी साँस ली।
तभी सास, शारदा देवी की आवाज़ आई —
“बहु, ज़रा सुनना।”
नीलम जल्दी से कमरे में गई, “जी माँजी, कुछ चाहिए?”
शारदा देवी मुस्कुराईं, “कल मीना आ रही है। बोल रही थी कि दो-तीन महीने यहीं रहेगी। डॉक्टर ने कहा है कि उसे थोड़ा आराम चाहिए।”
नीलम कुछ बोल ही नहीं पाई।
मीना! यानी उसकी ननद। वही मीना जो जब भी आती, घर में तूफान ले आती थी।
हर बात पर टोका-टोकी, हर चीज़ में गलती निकालना, और हर बार सास का पक्ष लेकर उसे नीचा दिखाना — यही मीना का तरीका था।
“माँजी, आप जानती हैं, वो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करती,”
नीलम ने हिचकते हुए कहा।
शारदा देवी ने धीरे से कहा, “हाँ बहु, जानती हूँ। पर इस बार वो ज़रा औरत बनकर आ रही है, लड़की नहीं। अब वो माँ बनने वाली है।”
नीलम चुप हो गई। कुछ जवाब नहीं दिया।
रात को उसने अपने पति रवि से कहा,
“तुम्हारी बहन आ रही है, अब दो महीने चैन से सोना मुश्किल है।”
रवि ने मुस्कुराकर कहा, “देखो नीलम, मैं मानता हूँ कि मीना थोड़ी तेज़ है, पर मम्मी की भी तो वही आँख का तारा है। और अब वो माँ बनने वाली है, हमें थोड़ा दिल बड़ा करना होगा।”
“दिल बड़ा कर लूँ, पर याद है ना रवि, पिछली बार क्या हुआ था?”
नीलम की आँखें भर आईं।
वो दिन उसे अब भी याद था — जब उसने शादी के बाद पहली बार घर संभाला था और मीना ने सबके सामने उसे नौकरानी कह दिया था।
तब रवि ने चुप रहना चुना था, और वो चुप्पी नीलम के दिल में गहरी चुभ गई थी।
दो दिन बाद मीना आ गई।
चेहरे पर वही पुरानी अकड़ थी, पर इस बार चाल धीमी थी — पेट थोड़ा बाहर निकला था।
“अरे भाभी! कैसी हो? तुम्हारे मशहूर टिफ़िन वाले पराठे अब भी बनते हैं क्या?”
नीलम ने हल्की मुस्कान दी, “अब नहीं मीना, अब थोड़ा कम तेल में बनते हैं।”
शारदा देवी ने प्यार से उसे गले लगाया,
“चल बेटी, पहले आराम कर। भाभी तेरे लिए खिचड़ी बना रही है।”
मीना ने मुस्कुराकर कहा, “भाभी हैं ना, तो सब मिल जाएगा।”
लेकिन उसके स्वर में वही पुरानी तुनकपन थी।
दिन बीतते गए..
शुरुआत में नीलम चुप रही।
वो बस काम करती, मुस्कुराती, और खुद को व्यस्त रखती।
मीना हर बात पर नुक्ताचीनी करती —
“भाभी, ये पर्दे इतने पुराने क्यों हैं?”
“अरे, ये बच्चे इतना शोर क्यों करते हैं?”
“आप तो हमेशा थकी हुई लगती हैं।”
शारदा देवी कभी बीच में समझातीं,
“मीना, तू थोड़ा कम बोल किया कर।”
पर मीना पर कोई असर नहीं होता।
नीलम को अब हर दिन भारी लगने लगा था।
कभी सोचती, “क्यों ना कुछ दिन मायके चली जाऊँ?”
पर फिर खुद को रोक लेती — “भागने से अच्छा है सब झेल लेना।”
एक दिन की घटना..
एक दोपहर अचानक मीना की तबीयत बिगड़ गई।
साँस तेज़ चलने लगी, चेहरा पीला पड़ गया।
शारदा देवी घबरा गईं।
“अरे नीलम! जल्दी देखो, मीना को क्या हो गया!”
नीलम बिना कुछ सोचे दौड़कर आई।
मीना को सहारा दिया, पानी पिलाया, और तुरंत रवि को फोन किया।
रवि ऑफिस से निकला तो उसने पहले ही डॉक्टर को बुला लिया।
डॉक्टर ने जाँच की और कहा,
“वो ठीक हैं, लेकिन बहुत स्ट्रेस में हैं। आराम चाहिए, और किसी से झगड़ा बिल्कुल नहीं।”
मीना ने आँखे मूँद लीं।
नीलम ने तकिया ठीक किया, और उसके बाल पीछे किए।
“आराम करो मीना, अब सब ठीक है।”
मीना ने धीरे से कहा,
“भाभी… मैं आपको पसंद नहीं करती थी, फिर भी आप मेरी इतनी परवाह क्यों कर रही हैं?”
नीलम ने मुस्कुराकर कहा,
“रिश्ते पसंद-नापसंद से नहीं निभते मीना, जिम्मेदारी से निभते हैं। तुम मेरे पति की बहन हो, और मेरी भी अपनी।”
मीना की आँखों से आँसू बह निकले।
वो फूट-फूटकर रो पड़ी।
“भाभी, मैंने बहुत बुरा किया आपके साथ। जब आपको भी बच्चा खोना पड़ा था, तब मैंने कुछ अच्छा नहीं कहा था। मुझे लगा था आप नाटक कर रही हैं…”
नीलम का गला भर आया।
“बस मीना, अब और मत कहो। जो बीत गया वो बीत गया।”
समय का पहिया घूम गया…
धीरे-धीरे मीना की तबीयत ठीक होने लगी।
वो अब ज़्यादा बोलती नहीं थी।
नीलम उसकी देखभाल में लगी रहती।
कभी उसके बालों में तेल लगाती, कभी उसके लिए सूप बनाती।
शारदा देवी अक्सर भावुक होकर कहतीं,
“सच कहूँ नीलम, तू मेरी बहु नहीं, मेरी बेटी है।”
और फिर एक दिन —
घर में किलकारियाँ गूंज उठीं।
मीना ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया।
डॉक्टर ने जब बच्ची को बाहर लाया,
नीलम ने ही सबसे पहले उसे गोद में लिया।
मीना ने कमजोर आवाज़ में कहा,
“भाभी, इसे आपकी गोद में ही बड़ा होना है। आप ही मेरी बच्ची की माँ जैसी हैं।”
नीलम की आँखें भी भर आईं।
“नहीं मीना, ये तेरी बेटी है, लेकिन हाँ… मैं इसकी दूसरी माँ ज़रूर बनूँगी।”
छह महीने बाद..
घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था।
मीना अब पहले जैसी नहीं रही।
वो अब नीलम के साथ रसोई में हँसती, बच्चों के साथ खेलती।
कभी खुद कहती,
“भाभी, सोचो अगर आप उस दिन मुझे बचाने नहीं आतीं, तो मैं ये बच्ची कभी नहीं देख पाती।”
नीलम बस मुस्कुरा देती।
एक दिन रात को बरामदे में बैठी नीलम बोली,
“माँजी, रिश्ते कभी एक दिन में नहीं बनते, पर एक सच्चा काम कई सालों का ग़ुस्सा मिटा सकता है।”
शारदा देवी ने कहा,
“सही कहा बहु। कभी-कभी परिवार टूटता नहीं, बस थक जाता है। और फिर किसी एक के धैर्य से सब जुड़ जाता है।”
नीलम ने आसमान की ओर देखा —
चाँद बादलों के
बीच से निकल आया था।
जैसे घर में भी अब अंधेरा खत्म हो गया था।
“कभी-कभी माफ़ी माँगने से ज़्यादा ताक़त माफ़ कर देने में होती है।”