मुंबई, सपनों और त्रासदियों का शहर। इसी शहर के सबसे आलीशान इलाके जूहू में, समंदर किनारे एक महल जैसा बंगला था – ‘सिंघानिया मेंशन’। यह घर था देश के सबसे बड़े कंस्ट्रक्शन टाइकून अरुण सिंघानिया का। 50 साल की उम्र में, उसके पास वह सब कुछ था जिसे दुनिया कामयाबी कहती है – बेहिसाब दौलत, शोहरत, ताकत।
लेकिन उस आलीशान बंगले की ठंडी दीवारों के पीछे, अरुण एक बहुत ही अकेली और बेचैन ज़िंदगी जीता था। उसकी पत्नी की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और उसकी कोई औलाद नहीं थी। उसकी रातें महंगी शराब और एक गहरे, अनकहे अपराध बोध के साए में कटती थीं।
बीस साल पहले, जब उसने अपने बिजनेस की शुरुआत की थी, तो उसने अपने सबसे अच्छे दोस्त और पार्टनर मोहन शर्मा को एक बहुत बड़ा धोखा दिया था। उसने जाली कागजात के सहारे मोहन की सारी हिस्सेदारी और मेहनत की कमाई हड़प ली थी और उसे सड़क पर ला खड़ा कर दिया था। उस धोखे के बाद मोहन टूट गया था और कुछ ही सालों में गरीबी और बीमारी से लड़ते-लड़ते इस दुनिया से चला गया था।
यह गुनाह, जो सिर्फ अरुण जानता था, एक नासूर की तरह सालों से उसकी रूह को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
इसी शहर के दूसरे छोर पर, धारावी की तंग, बदबूदार गलियों में 10 साल का राजू रहता था। उसके पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उसकी माँ, सीता, लोगों के घरों में चौका-बर्तन करके जैसे-तैसे अपना और अपने बेटे का पेट पालती थी।
राजू की आँखों में गरीबी की लाचारी नहीं, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। वह पढ़ने में बहुत होशियार था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब रहने लगी थी। डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें आराम और अच्छी दवाइयों की ज़रूरत है – दो ऐसी चीज़ें जो उनके लिए विलासिता थीं।
अपनी माँ को इस तरह घुटते देख, उस 10 साल के बच्चे ने काम करने की ठानी। उसने कुछ पैसे उधार लेकर पेन खरीदे और स्कूल के बाद शहर के एक बड़े ट्रैफिक सिग्नल पर उन्हें बेचना शुरू कर दिया।
जुलाई का महीना था, मुंबई की बारिश अपने पूरे शबाब पर थी। ट्रैफिक जाम था। अरुण सिंघानिया अपनी चमचमाती ऑडी में बैठा परेशान हो रहा था। तभी उसकी नज़र सड़क किनारे बारिश में भीगते एक बच्चे पर पड़ी। वह राजू था। वह कांप रहा था, लेकिन अपने हाथ में पकड़े पेनों को बारिश से बचाने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
“साहब, पेन ले लो! 10 रुपये का एक है!” वह हर गाड़ी का शीशा खटखटा रहा था।
अरुण की नज़रें उस बच्चे पर टिक गईं। उसकी आँखों में एक ऐसी ज़िद थी, एक ऐसा स्वाभिमान था, जिसने उसे अपने दोस्त मोहन की याद दिला दी।
अरुण ने शीशा नीचे किया। “ए लड़के, इधर आओ।”
राजू दौड़कर आया। “पेन चाहिए साहब?”
“कितने हैं तुम्हारे पास?”
“जी, 10 पेन हैं।”
“मैं सारे खरीदूंगा। कितने पैसे हुए?”
“100 रुपये साहब।”
अरुण ने 500 के दो नोट निकाले। “यह लो 1000 रुपये। बाकी तुम रख लो।”
राजू ने नोटों को देखा, फिर हैरानी से बोला, “साहब, मैं भीख नहीं लेता। मेरे पास छुट्टे नहीं हैं।”
अरुण सिंघानिया – वह इंसान जिसके सामने दुनिया झुकती थी, आज एक 10 साल के बच्चे के स्वाभिमान के सामने निशब्द खड़ा था। उसने ड्राइवर से 100 रुपये लेकर राजू को दिए। राजू ने उसे एक पेन दिया और बाकी नौ पेन भी उसकी तरफ बढ़ा दिए।
“यह क्या है?” अरुण ने पूछा।
“साहब, आपने एक पेन के 100 रुपये दिए हैं, तो बाकी के नौ भी आपके हुए।”
“यह तुम रखो,” अरुण की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी।
उस रात अरुण सो नहीं पाया। उस बच्चे का चेहरा और उसकी ईमानदारी उसे कचोट रही थी। उसे लगा जैसे किस्मत उसे उसके गुनाहों का प्रायश्चित करने का एक मौका दे रही है।
अगले दिन, वह खुद धारावी की उन तंग गलियों में राजू का पता ढूँढता हुआ पहुँचा। जब उसने राजू को अपनी बीमार माँ को दलिया खिलाते देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसने सीता के हाथ जोड़कर कहा, “बहन जी, मैं आपके बेटे की मदद करना चाहता हूँ। मैं इसे गोद लेकर पढ़ाना चाहता हूँ।”
सीता ने कहा, “साहब, हम गरीब हैं, पर बेटे को बेचते नहीं।”
“नहीं-नहीं,” अरुण ने घबराकर कहा, “मैं उसे आपसे छीन नहीं रहा। मैं बस उसे एक बेहतर भविष्य देना चाहता हूँ। मेरे कोई औलाद नहीं है। इसने मुझे जीने की एक नई वजह दी है।”
उस दिन के बाद राजू की दुनिया बदल गई। वह शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगा, सीता का इलाज बड़े अस्पताल में होने लगा। अरुण, राजू के लिए सिर्फ एक मददगार नहीं, बल्कि एक पिता बन गया। राजू ने भी अरुण के अकेलेपन को अपने प्यार से भर दिया।
15 साल बीत गए। राजू अब 25 साल का एक आत्मविश्वासी नौजवान था, जो लंदन से MBA करके लौटा था। अरुण ने उसकी वापसी पर एक शानदार पार्टी रखी, जहाँ वह राजू को अपने करोड़ों के साम्राज्य का इकलौता वारिस घोषित करने वाला था।
राजू अपने कमरे में सामान रख रहा था कि उसकी नज़र अपनी माँ सीता की मेज पर रखी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी। “माँ, ये कौन हैं?”
सीता की आँखें भर आईं। “बेटा, ये तुम्हारे असली पिता हैं, मोहन शर्मा। वह दुनिया के सबसे अच्छे इंसान थे। उनका एक जिगरी दोस्त था, अरुण। दोनों ने मिलकर कंपनी शुरू की थी। तुम्हारे पिता ने उस पर खुद से ज़्यादा भरोसा किया। लेकिन उस दोस्त ने उन्हें धोखा दिया… जाली दस्तखत करके सब कुछ हड़प लिया। तुम्हारे पिता यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए और…”
राजू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “अरुण? कौन अरुण?”
उसे जवाब मिल चुका था।
शाम को पार्टी में, अरुण ने गर्व से माइक संभाला, “देवियों और सज्जनों, मिलिए मेरे बेटे और मेरे साम्राज्य के वारिस, राजू सिंघानिया से!”
राजू स्टेज पर आया। उसका चेहरा सपाट था, आँखों में एक तूफानी खामोशी।
“शुक्रिया पापा। आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। लेकिन आज मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ – दोस्ती और धोखे की कहानी।”
राजू ने मोहन शर्मा की पूरी कहानी सुनाई, बिना किसी का नाम लिए। अरुण सिंघानिया का चेहरा सफेद पड़ गया, माथे पर पसीना आ गया।
कहानी खत्म करके राजू अरुण की तरफ मुड़ा, “क्या आप उस धोखेबाज़ दोस्त को जानते हैं, पापा?”
अरुण वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा। “मुझे… मुझे माफ कर दो बेटे…”
पूरी महफिल सन्न रह गई। राजू का दिल टूट गया। जिस इंसान को वह भगवान मानता था, वही उसके पिता का कातिल निकला।
उस रात के बाद, सिंघानिया मेंशन में मातम पसर गया। अरुण ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। राजू भी सदमे में था। वह नफरत करना चाहता था, बदला लेना चाहता था, लेकिन 15 साल का प्यार उसे रोक रहा था।
कुछ दिनों बाद, राजू अरुण के कमरे में गया।
“पापा, उठिए।”
“मुझे पापा मत कहो! मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ! यह सारी दौलत तुम्हारे पिता की है। इसे ले लो और मुझे सज़ा दो!” अरुण रो रहा था।
राजू ने एक फाइल आगे बढ़ाई। “यह ‘मोहन शर्मा फाउंडेशन‘ के कागजात हैं। मैंने आपकी आधी दौलत इसके नाम कर दी है। यह फाउंडेशन उन गरीब बच्चों को पढ़ाएगा जो पैसों की कमी से अपने सपने पूरे नहीं कर पाते।”
अरुण अविश्वास से उसे देख रहा था।
“पापा, आपने मेरे पिता की ज़िंदगी छीनी थी,” राजू की आवाज़ भर्रा गई, “लेकिन यह भी सच है कि आपने मुझे एक नई ज़िंदगी दी है। नफरत को सिर्फ मोहब्बत और माफी से ही जीता जा सकता है। मैं अपने पिता को वापस नहीं ला सकता, लेकिन मैं उनके सपनों को ज़िंदा रख सकता हूँ। और इस काम में मुझे आपकी ज़रूरत है।”
अरुण अपने बेटे के पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज 20 साल बाद, उसकी रूह को गुनाहों से माफी मिल गई थी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि कर्म का सिद्धांत कभी खाली नहीं जाता। लेकिन माफी की ताकत उससे भी बड़ी है, जो नफरत को प्यार में बदल सकती है।