अध्याय 1: रहस्यमयी भिखारिन
जयपुर शहर की अदालत के बाहर एक बूढ़ी भिखारिन महिला हर दिन चुपचाप बैठी रहती थी। उसका नाम कोई नहीं जानता था। कुछ लोग उसे प्यार से ‘अम्मा’ कहते, तो कुछ उसे हिकारत भरी नज़रों से ‘पागल’ कहकर आगे बढ़ जाते। वह कुछ नहीं बोलती। उसके सामने रखा टिन का कटोरा अक्सर खाली रहता। मगर उसकी आँखों में कुछ था, जैसे वह किसी को पहचानती हो, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो।
हर सुबह ठीक 9 बजे अम्मा उसी शारदा मंदिर के पास आकर बैठ जाती। उनकी कमर झुकी हुई थी, फिर भी वह पूरी शान से सीधे बैठतीं, जैसे कोई पुराना सैनिक अपनी आखिरी सलामी दे रहा हो। उनकी नज़रें सड़क पर टिकी रहतीं, मगर अक्सर कोर्ट के गेट पर ठहर जातीं।
कभी-कभी कुछ नौजवान वकील उनकी तरफ देखकर हँसते, “लगता है यह भी कोई मुकदमा लड़ने आई है।” कोई कहता, “शायद यह न्यायाधीश बनने का सपना देखती होगी।” अम्मा चुप रहतीं, न गुस्सा, न हँसी, बस एक गहरी शांति।
अध्याय 2: अदालत का बुलावा
उस दिन जयपुर कोर्ट में कुछ खास था। शहर के सबसे चर्चित निर्माण घोटाले की सुनवाई थी, जिसमें कई बड़े-बड़े लोग फंसे थे। कोर्ट रूम नंबर तीन खचाखच भरा था। जज साहब राजेश अग्रवाल अपनी कुर्सी पर बैठने वाले थे। वह अपने सख्त और निष्पक्ष फैसलों के लिए मशहूर थे।
सुबह 11 बजे कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई। वकीलों में तीखी बहस चल रही थी। माहौल में तनाव था।
तभी न्यायाधीश ने अचानक सामने देखा। उनकी नज़र खिड़की से बाहर चली गई, जैसे कोई पुरानी याद उनके दिल को छू गई हो। उन्होंने अपने क्लर्क की तरफ देखा और धीरे से कहा, “क्या कोर्ट परिसर के मंदिर के बाहर जो बूढ़ी भिखारिन बैठी है, उसे अंदर बुलाया जा सकता है?”
पूरा कोर्ट रूम स्तब्ध रह गया। वकील एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। एक पत्रकार ने फुसफुसाया, “यह क्या हो रहा है?” आखिर न्यायाधीश ने एक भिखारिन को कोर्ट में क्यों बुलाया?
उस वक्त अम्मा मंदिर के बाहर अपनी पुरानी चादर में लिपटी बैठी थीं। तभी दो सुरक्षाकर्मी उनके पास आए: “अम्मा, न्यायाधीश ने आपको बुलाया है।”
अम्मा की आँखें कांप उठीं। उन्होंने धीरे से सिर उठाया, कांपते हाथों से अपनी छड़ी उठाई और खड़ी हुईं।
जब अम्मा कोर्ट रूम में दाखिल हुईं, तो वहाँ सन्नाटा छा गया। फटी हुई साड़ी, थकी हुई आँखें और कांपते पैर। मगर उनमें एक अजीब सा आत्मविश्वास था, ऐसा जो उस कोर्ट रूम में मौजूद किसी भी रईस या बड़े वकील में नहीं था।
न्यायाधीश ने एक पल के लिए सिर झुकाया, जैसे किसी को सम्मान दे रहे हों। फिर उन्होंने पूछा, “आपका नाम?”
अम्मा की आवाज़ में हल्का सा कंपन था, “नाम… अब नाम नहीं रहा, साहब।”
और तब, जस्टिस राजेश अग्रवाल अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए। कोर्ट में मौजूद हर शख्स की साँसें जैसे थम गईं।
उन्होंने एक बेंच की ओर इशारा किया और कहा, “आइए, आप यहाँ बैठिए।”
अम्मा कांपते हुए उस बेंच पर बैठीं।
“आप रोज़ यहाँ आती हैं,” न्यायाधीश ने पूछा। “क्या आप कुछ कहना चाहती हैं?”
अम्मा ने धीरे से सिर उठाया, उनकी आँखें गीली थीं, मगर आवाज़ में एक अजीब सी ताकत थी। “कहना तो बहुत कुछ था, साहब। मगर सुनने वाला कोई नहीं था। इसलिए चुप हो गई।”
“आप रोज़ इस कोर्ट को देखती हैं। कोई खास वजह?”
अम्मा ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं। फिर बोलीं, “यह वही जगह है, साहब, जहाँ मैंने कभी न्याय के लिए आवाज़ उठाई थी। जहाँ मैं कभी… एक वकील हुआ करती थी।”
अध्याय 3: अतीत का पर्दाफाश
यह सुनते ही कोर्ट में सन्नाटा छा गया। एक भिखारिन… वकील थी?
अम्मा ने अपने पुराने झोले से एक पीला, फटा हुआ लिफाफा निकाला। उसमें कुछ पुराने कागज़ थे: एक वकालतनामा, एक पुराना पहचान पत्र और एक अधूरी याचिका।
न्यायाधीश राजेश ने वह कागजात पढ़े। जैसे-जैसे वह पढ़ते गए, उनके माथे की लकीरें गहरी होती गईं। “आप… आप एडवोकेट रमा देवी हैं?”
“थी,” अम्मा ने जवाब दिया। “मगर बेटी की गलती का इल्जाम मुझ पर आया। मैं चुप रही, सोचा बेटी बच जाए। अदालत ने मुझे दोषी ठहराया, मेरी सारी संपत्ति जब्त हो गई, जेल गई। जब बाहर आई, तो बेटी सब बेचकर जा चुकी थी।”
कोर्ट में मौजूद हर शख्स की आँखें नम थीं। जो वकील पहले अम्मा का मज़ाक उड़ाते थे, वो अब शर्मिंदगी से सिर झुकाए खड़े थे।
जस्टिस राजेश अपनी कुर्सी से उठे, अम्मा के पास आए और उनका हाथ थाम लिया। “हमने न्याय को सिर्फ कानून की किताबों में बाँध दिया,” उन्होंने nghẹn ngào कहा, “मगर आपने इसे अपनी ज़िंदगी में जिया।”
एक युवा महिला वकील अपनी जगह से उठीं: “माई लॉर्ड, यह सिर्फ एक त्रासदी नहीं है, यह हमारे सिस्टम की चूक है। मैं इस मामले की दोबारा सुनवाई की याचिका दायर करती हूँ!”
अध्याय 4: इंसाफ की वापसी
रमा देवी का केस फिर से खोला गया। सच सामने आया। उनकी बेटी प्रीति ही असली घोटालेबाज थी और उसने अपनी माँ के नाम पर सारी संपत्ति कर रखी थी। जब मामला खुला, तो रमा देवी ने अपनी बेटी को बचाने के लिए चुपचाप सज़ा कबूल कर ली।
जस्टिस राजेश अग्रवाल के लिए यह सिर्फ एक केस नहीं था। 20 साल पहले, लॉ यूनिवर्सिटी में रमा देवी उनकी प्रेरणा थीं। उनकी एक बात आज भी राजेश की डायरी में लिखी थी: “अगर वकालत को सिर्फ धंधा समझोगे, तो यह दुकान बन जाएगी। मगर अगर इसे इंसान की आवाज़ समझोगे, तो यह इबादत बन जाएगी।”
उन्होंने इस केस को खुद सुना। प्रीति को कोर्ट में पेश किया गया। महंगे कपड़ों में लिपटी, पर आँखें झुकी हुईं।
“क्या तुम्हें पता था कि तुम्हारी माँ तुम्हारी वजह से जेल में थीं?” जस्टिस राजेश ने पूछा।
“मुझे… मुझे नहीं पता था कि…” प्रीति हकलाने लगी।
आखिरकार, अदालत ने फैसला सुनाया: श्रीमती रमा देवी निर्दोष हैं। उन्हें उनका लाइसेंस वापस दिया जाए, 25 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, और सरकार सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।
अगले दिन, अम्मा फिर उसी मंदिर के बाहर बैठी थीं। मगर अब लोग उनके सामने झुक रहे थे। जस्टिस राजेश चुपके से उनके पास आए और बैठ गए।
“आज मैंने न्याय नहीं किया,” उन्होंने कहा, “आज मैंने सिर्फ अपनी गुरुदक्षिणा का एक छोटा सा कर्ज चुकाया है।”
अम्मा मुस्कुराईं। “बेटा, आज तुम सिर्फ न्यायाधीश नहीं, इंसान भी बने हो।”
रमा देवी की कहानी हमें सिखाती है कि न्याय में देरी हो सकती है, पर अंधेर नहीं। और इंसान का आत्मसम्मान उसकी सबसे बड़ी दौलत है, जिसे कोई हालात नहीं छीन सकते।