अध्याय 1: बस का वो मंज़र
शाम के 4 बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंडक में लखनऊ की सड़कों पर चलती बसें अपनी धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही थीं। हजरतगंज से गोमती नगर जा रही एक सरकारी बस पूरी तरह खचाखच भरी हुई थी। लोग एक-दूसरे पर झुके हुए, थकान से चूर, अपने मोबाइल में खोए हुए थे।
बस के अगले दरवाजे से एक बुजुर्ग महिला चढ़ीं। उम्र रही होगी करीब 75। चेहरे पर झुर्रियाँ गहरी थीं, आँखें अंदर धँसी हुईं। उन्होंने एक पुरानी, धुली हुई हल्के पीले रंग की सूती साड़ी और एक फटा हुआ शॉल ओढ़ रखा था। उनके पैर की चप्पल की एक पट्टी भी टूटी हुई थी।
जैसे ही उन्होंने बस में पहला कदम रखा, कुछ लोगों ने नाक सिकोड़ ली। किसी ने बुदबुदाते हुए कहा, “सारी भिखारिनें अब बसों में ही चढ़ने लगी हैं।”
बुजुर्ग महिला ने किसी की तरफ नहीं देखा। चुपचाप एक कोने में जाकर सीट के नीचे बैठ गईं, जहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी। उनकी साँसें तेज चल रही थीं।
कुछ मिनट बाद कंडक्टर आया। वह करीब 30-32 साल का नौजवान था, थका हुआ और चिड़चिड़ा। “टिकट! टिकट दिखाओ! हजरतगंज से कहाँ जाना है?”
जब वह बुजुर्ग महिला के पास पहुँचा, उसने झिड़कते हुए कहा, “ए अम्मा! कहाँ से चढ़ी? टिकट निकालो।”
बुजुर्ग महिला ने धीमे स्वर में कहा, “बेटा, मेरे पास पैसे नहीं हैं… लेकिन मुझे KGMU अस्पताल जाना है। बहुत जरूरी है, मेरी दवा…”
कंडक्टर का चेहरा तमतमा गया। “बहाना मत बनाओ! सब यही ड्रामा करते हैं! अस्पताल जाना है, बच्चा बीमार है! उतर जाओ चुपचाप! मुफ्तखोरी की आदत पड़ गई है तुम लोगों को!”
बस में सन्नाटा था, लेकिन कोई नहीं बोला। कुछ लोगों ने नज़रें फेर लीं।
बुजुर्ग महिला कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन कंडक्टर ने उनका हाथ पकड़ा और चिल्लाकर ड्राइवर से कहा, “अगले स्टॉप पर रोक देना! इन्हें बाहर फेंकना है!”
बस रुकी। कंडक्टर ने बुजुर्ग महिला का हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए बाहर उतार दिया। उनका झोला गिरा, दवाइयों का पुराना पर्चा उड़कर सड़क पर गिर गया। बुजुर्ग महिला वहीं फुटपाथ पर बैठ गईं, थक कर, शर्म से, और शायद दर्द से भी। बस फिर से चलने लगी।
अध्याय 2: इंसानियत की आवाज़
लेकिन सीट के पास खड़ी एक महिला, प्रिया, जिसकी उम्र करीब 30 साल रही होगी, गहरे हरे रंग की सूती सलवार-कमीज पहने, साधारण सी दिख रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग चमक थी। वह यह सब देख रही थी।
“बस रोको!” वह तेज़ आवाज़ में चिल्लाई।
ड्राइवर चौंका। “मैडम, बीच में कहाँ रुकेंगे?”
“मैंने कहा बस रोको!” उसकी आवाज़ में वह अधिकार था कि बस सचमुच रुक गई। अब सबकी नज़रें उसकी ओर थीं। वह तेज़ी से नीचे उतरी और उसी ओर चल पड़ी जहाँ वह बुजुर्ग महिला अब भी बैठी थीं।
बस में बैठे लोग बुदबुदा रहे थे, “ड्रामा करने निकली है। दूसरों के चक्कर में क्यों पड़ रही है?”
लेकिन प्रिया का ध्यान सिर्फ उस बुजुर्ग महिला पर था। वह तेज़ी से उनके पास पहुँची। “अम्मा, आप ठीक हैं?”
बुजुर्ग महिला ने सिर उठाया, आँखों में आँसू थे। “बेटी, बस में बैठने दिया होता तो ठीक था। अब यहीं बैठ जाऊँगी।”
प्रिया वहीं सड़क के किनारे उनके पास बैठ गई। उनका थैला उठाया, दवाइयों की पर्चियाँ सीधी कीं। “आपको KGMU क्यों जाना था?”
“ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया है बेटा। डॉक्टर ने आज बुलाया था, पर पैसे नहीं थे…”
प्रिया ने गहरी साँस ली। जेब से फोन निकाला। “हाँ राकेश? तुरंत एक कार भेजो मेरे पास। हाँ, वहीं जहाँ तुम्हारे कंडक्टर ने मुझे बस से उतरवाया। जल्दी!”
बुजुर्ग महिला कुछ समझ नहीं पाईं। “बेटी, तुम कौन हो?”
वह मुस्कुराई। “एक इंसान, जो चुप रहना नहीं जानती।”
कुछ ही मिनटों में एक चमचमाती काली सेडान आकर रुकी। कांच पर टैग था: “सेवारथ ट्रांसपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड“।
बुजुर्ग महिला की आँखें फैल गईं। यह तो वही कंपनी थी जो शहर की सारी बसें चलाती थी!
प्रिया ने कार का दरवाज़ा खोला, बुजुर्ग महिला को सहारा देकर बिठाया, खुद पीछे बैठी और ड्राइवर से कहा, “सीधा KGMU, वीआईपी इमरजेंसी से एंट्री।”
वह बस अब भी थोड़ी दूर पर रुकी थी। कंडक्टर और यात्री खिड़की से सब देख रहे थे।
कंडक्टर हक्का-बक्का था। उसका चेहरा पसीने से भीग गया। “यह… यह तो मेन कंपनी की डायरेक्टर हैं! प्रिया मैडम!”
अध्याय 3: सम्मान की कीमत
अस्पताल में बुजुर्ग महिला को तुरंत भर्ती कर लिया गया। प्रिया ने रिसेप्शन पर कहा, “इनके सारे इलाज का खर्च मेरी कंपनी उठाएगी।”
डॉक्टरों ने जांच के बाद कहा, “अगर आधा घंटा और देर होती तो हार्ट अटैक का खतरा था।”
प्रिया चुपचाप सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर न कोई घमंड था, न घबराहट। बस एक सुकून था कि समय रहते मदद पहुँच गई।
“आप इनकी कौन हैं?” डॉक्टर ने पूछा।
प्रिया ने सिर्फ इतना कहा, “कोई नहीं। बस एक अजनबी जिसने देर से नहीं, समय पर इंसानियत चुनी।”
अध्याय 4: सबक
अगले दिन लखनऊ की न्यूज़ वेबसाइट्स पर हेडलाइन थी: “बस से निकाली गई बुजुर्ग की मदद करने वाली महिला निकली ‘सेवारथ ट्रांसपोर्ट’ की सीईओ। जब पूरी बस चुप थी, तब एक आवाज़ इंसानियत बनकर उठी।”
सोशल मीडिया पर प्रिया की तारीफ होने लगी।
तीसरे दिन सुबह 10 बजे, अस्पताल के बाहर वही बस आकर रुकी। वही कंडक्टर, लेकिन आज यूनिफार्म साफ-सुथरी थी, आँखों में शर्म थी और हाथों में गुलदस्ता। वह सीधा वार्ड में गया जहाँ बुजुर्ग महिला अब ठीक होकर प्रिया के साथ चाय पी रही थीं।
कंडक्टर ज़मीन पर बैठ गया और बोला, “साहब… मुझे माफ़ कर दीजिए।”
बुजुर्ग महिला मुस्कुराईं, “आओ बेटा, बैठो।”
कंडक्टर ने nghẹn ngào कहा, “उस दिन मैंने एक इंसान को नहीं पहचाना। मैंने बस वर्दी पहन कर सोच लिया कि मेरी जिम्मेदारी पैसे गिनना है, इंसान नहीं। लेकिन जब मैंने अखबार में पढ़ा कि आपने, मैडम, अपनी पहचान तक नहीं बताई, तब समझ आया कि सच्चाई खुद बोलती है।”
प्रिया ने धीरे से कहा, “गलतियाँ इंसान से होती हैं। लेकिन जब कोई गलती से सीख ले, तो वह इंसान बन जाता है।”
एक हफ्ते बाद, सेवारथ ट्रांसपोर्ट की सभी बसों पर एक नया स्टीकर चिपका हुआ था: “अगर किसी ने मदद मांगी और आपके पास देने को कुछ नहीं है, तो कम से कम एक इंसानियत भरा जवाब ज़रूर दीजिए।”
और हर बस में एक सीट ‘इमरजेंसी ह्यूमैनिटी सीट’ के नाम से आरक्षित कर दी गई – उन लोगों के लिए जो पैसे से नहीं, ज़रूरत से चढ़ते थे।