दोस्तों, क्या कभी सोचा है कि किस्मत भी कभी एक प्याली चाय में छुपी हो सकती है?
सुबह के करीब 9:30 बजे का वक्त था। महाराष्ट्र के एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर, एक कोने में खड़ा था एक साधारण सा लड़का, आरव। अपनी छोटी सी चाय की दुकान पर मुस्कुराते हुए यात्रियों को चाय पिला रहा था। आरव की मुस्कान में एक अलग ही अपनापन था।
तभी स्टेशन के बाहर एक चमचमाती कार आकर रुकी, जिसमें से उतरी एक लड़की, अन्वी। वह देखने में बिल्कुल किसी फिल्म की हीरोइन जैसी लग रही थी। अन्वी धीरे-धीरे चलते हुए आरव के चाय के ठेले तक आई। पहले कुछ पल उसे चुपचाप निहारती रही, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली, “जनाब, एक प्याली चाय मिलेगी क्या?”
आरव ने भी पूरे अपनेपन के साथ चाय थमाई। जैसे ही अन्वी ने पहला घूँट लिया, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक दौड़ गई। चाय पीते-पीते वह आरव से बातें करने लगी, हँसते हुए, मुस्कुराते हुए, जैसे कोई राजकुमारी आम ज़िंदगी में उतर आई हो।
लेकिन दोस्तों, असली चौंकाने वाला पल तो तब आया जब चाय खत्म करने के बाद अन्वी ने बड़ी ही मासूमियत से वह सवाल पूछा जिसने आरव के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी।
“क्या तुम मुझसे शादी करोगे?”
आरव चौंक गया। साँसें थम गईं। उसे यकीन ही नहीं हुआ कि इतनी अमीर, इतनी खूबसूरत लड़की, उससे, एक मामूली से चाय वाले से, ऐसा सवाल कर सकती है। लेकिन दोस्तों, यह सिर्फ एक सवाल नहीं था। यह शुरुआत थी एक ऐसी सच्ची कहानी की जिसका अंजाम खुद आरव को भी मालूम नहीं था।
आरव का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। उसका परिवार बहुत साधारण था। रुपया-पैसा भले ही कम था, लेकिन प्यार और खुशियाँ थीं। आरव पढ़ाई में तेज था, लेकिन गरीबी ने उसे वक्त से पहले बड़ा बना दिया। स्कूल पूरा करते ही वह अपने पिता के साथ मजदूरी करने लगा।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक दुर्घटना में पिता की मौत हो गई। 17 साल के आरव पर माँ और छोटी बहन की जिम्मेदारी आ गई। उसने मुंबई जाने का फैसला किया, सपनों का शहर।
मुंबई में, उसने अपने दोस्त राहुल के पिता की मदद से एक जूता कारखाने में काम शुरू किया। काम कठिन था, दिन भर खड़े रहना पड़ता, हाथों में छाले पड़ जाते। लेकिन आरव ने हार नहीं मानी। दिन में कारखाने में पसीना बहाता और रात को स्टेशन के पास एक छोटी सी चाय की दुकान पर बूढ़े माधव बाबा के साथ काम करता।
माधव बाबा, जो खुद बेसहारा थे, आरव की मेहनत और मासूमियत देखकर उसे अपना बना लिया। “बेटा, तू मेरा सहारा बन जा, यह दुकान तेरी।”
आरव ने दोनों जगह जमकर काम किया और पैसे बचाकर गाँव भेजने लगा। जब बहन प्रियंका की शादी तय हुई, तो उसने अपनी सारी जमा-पूंजी लेकर गाँव लौटा और धूमधाम से बहन की शादी की।
शादी के बाद वह फिर मुंबई लौट आया। इस बार उसका इरादा पक्का था – उसे ज़िंदगी बनानी थी। उसने अपना पूरा ध्यान माधव बाबा की चाय की दुकान पर लगा दिया। वह बाबा की सेवा अपने पिता की तरह करता। उसकी ज़िंदगी सादा थी, पर सुकून भरी।
लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था।
सावन की पहली तेज बारिश हो रही थी। पूरा स्टेशन भीग चुका था। आरव अपने ठेले को बचाने की कोशिश कर रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह अकेली, भीगी हुई, कांप रही थी। उसके चेहरे पर गहरी उदासी और खौफ था। वह अन्वी थी।
इससे पहले कि आरव कुछ समझ पाता, अन्वी लड़खड़ाई और प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ी।
भीड़ में से कोई आगे नहीं आया। लोग तमाशा देख रहे थे। लेकिन आरव का दिल, जिसे माँ ने इंसानियत का पाठ पढ़ाया था, वह एक पल भी नहीं रुका।
आरव बारिश में दौड़ पड़ा। उसने अन्वी को अपनी गोद में उठाया। वह ऑटो रिक्शा रोकने लगा, पर कोई भी एक भीगी हुई, बेहोश लड़की को बिठाने को तैयार नहीं था। आरव ने हार नहीं मानी। वह उसे गोद में उठाए हुए ही पास के एक छोटे से प्राइवेट हॉस्पिटल की ओर भागा।
“डॉक्टर! इसे बचाइए!” वह चिल्लाया।
“पहले पैसे जमा करो,” रिसेप्शनिस्ट ने कहा।
आरव ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने अपनी जेब से सारे पैसे निकाल दिए – वह पैसे जो उसने अपनी माँ को भेजने के लिए जमा किए थे। “यह सब रख लीजिए, पर इसे बचाइए!”
डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। आरव बाहर भीगा हुआ, थका हुआ बैठा दुआ मांगता रहा। कुछ घंटों बाद डॉक्टर बाहर आए।
“चिंता की कोई बात नहीं। लड़की खतरे से बाहर है।” डॉक्टर ने बताया, “यह अन्वी मेहरा है, बिजनेसमैन प्रशांत मेहरा की बेटी। उसे पानी और बारिश से पैनिक अटैक आता है, एक पुराने हादसे की वजह से।”
आरव ने चुपचाप सब सुना। और जब उसे यकीन हो गया कि अन्वी सुरक्षित है, तो वह चुपचाप अस्पताल से निकल गया, बिना अपना नाम बताए, बिना किसी इनाम का इंतज़ार किए।
जब अन्वी को होश आया, तो उसे बस एक धुंधली सी याद थी – किसी की गर्मजोशी भरी बाहें और एक आवाज़ जो कह रही थी, “हिम्मत रखो।” नर्सों ने उसे उस चाय वाले के बारे में बताया जिसने अपने सारे पैसे उसके इलाज के लिए दे दिए थे।
अन्वी का दिल भर आया।
यही वजह थी कि एक हफ्ते बाद वह उस स्टेशन पर थी। वह अपने फरिश्ते को ढूँढ रही थी। और जब उसने आरव की वही मासूम मुस्कान देखी, तो वह समझ गई कि यह आदमी न सिर्फ उसकी जान बचाने वाला है, बल्कि उसकी ज़िंदगी बदलने वाला भी है।
और इसीलिए उसने वह सवाल पूछा: “क्या तुम मुझसे शादी करोगे?”
आरव को लगा वह मज़ाक कर रही है। “मैडम, मैं एक चाय वाला हूँ।”
“मैं मज़ाक नहीं कर रही,” अन्वी ने कहा। “मेरे पास सब कुछ है, बस वह सच्चाई और इंसानियत नहीं है जो तुम्हारी आँखों में है। मुझे तुम्हारी दौलत नहीं, तुम्हारा दिल चाहिए।”
यह खबर मुंबई में आग की तरह फैल गई। अन्वी के पिता, प्रशांत मेहरा, पहले तो बहुत नाराज़ हुए। लेकिन जब अन्वी ने उन्हें पूरी कहानी बताई, और जब उन्होंने खुद आरव की ईमानदारी और मेहनत को परखा, तो उनका दिल पिघल गया।
“मैं अपनी बेटी को दुनिया की हर दौलत दे सकता हूँ,” उन्होंने आरव से कहा, “लेकिन एक अच्छा और सच्चा पति नहीं खरीद सकता। तुमने साबित कर दिया कि तुम मेरी बेटी के लायक हो।”
उनकी शादी धूमधाम से हुई। स्टेशन का वह चाय वाला रातों-रात शहर का हीरो बन गया। अखबारों ने लिखा: “एक चाय वाले की नेकी ने जीता करोड़ों का दिल।”
लेकिन आरव नहीं बदला। उसने अपने ससुर की एक कंपनी संभाली और उसे अपनी मेहनत से नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया।
आज वे अपने दो बच्चों के साथ खुशहाल ज़िंदगी जी रहे हैं। आरव ने अपनी माँ को भी मुंबई बुला लिया। वह अपने अतीत को कभी नहीं भूला। वह हर साल गरीबों को स्कॉलरशिप और मुफ्त चाय-खाना बांटता है।
कभी-कभी, जब बारिश की पहली बूँदें गिरती हैं, तो आरव और अन्वी मुस्कुराते हुए उस पुराने रेलवे स्टेशन की तरफ देखते हैं, जहाँ एक प्याली चाय ने दो दिलों को हमेशा के लिए जोड़ दिया था।