अध्याय 1: वेटर और शहज़ादी
मुंबई, सपनों का शहर, जहाँ द ग्रैंड सेरेनिटी जैसा आलीशान 5-स्टार होटल अपनी चमक बिखेरता था। इसी होटल में मयंक काम करता था। 25 साल का दुबला-पतला लड़का, आँखों में मासूमियत और बदन पर होटल की सफेद यूनिफॉर्म।
मयंक का एक ही नियम था: कितनी भी थकान हो, मेहमानों के सामने हमेशा मुस्कुराते हुए सिर झुकाना और ‘जी सर, जी मैडम’ कहना। उसकी शालीनता और धैर्य के लिए लोग उसकी तारीफ करते थे, लेकिन दुनिया का सच यही है कि तारीफ करने वाले कम और अपमान करने वाले ज़्यादा मिलते हैं।
मयंक की दुनिया छोटी थी। दिन में होटल की नौकरी, रात में किराए का छोटा कमरा और गाँव में अपनी बीमार माँ के लिए दवाइयाँ। वह शिकायत नहीं करता था, बस पसीना बहाता था।
दूसरी तरफ थी शनाया। 20 साल की, एक बड़े बिजनेसमैन की बेटी। महंगे कपड़े, ब्रांडेड पर्स और चाल में ऐसा गुरूर कि कोई आँख मिलाने की हिम्मत न करे। शनाया के लिए, अमीर होना ही इंसान होने की पहचान थी। वह होटल के स्टाफ को उंगलियों पर नचाती थी। उसकी नज़र में गरीब लोग सिर्फ नौकर थे, इंसान नहीं।
स्टाफ उसकी बदतमीज़ी सहता था, क्योंकि वे जानते थे कि वह मालिक की बेटी की सहेली है और उसका परिवार बहुत रसूख वाला है।
लेकिन ज़िंदगी अक्सर वहीं पलटती है जहाँ हमें लगता है सब कंट्रोल में है। शनाया को लगता था कि वह पैसे से किसी की भी इज़्ज़त खरीद सकती है, और मयंक को लगता था कि चुप रहना ही उसकी किस्मत है। मंच तैयार था, बस एक छोटी सी चिंगारी की ज़रूरत थी।
अध्याय 2: वो थप्पड़
रात का वक्त था। द ग्रैंड सेरेनिटी की लॉबी क्रिस्टल झूमरों की रोशनी में नहा रही थी। वायलिन की मधुर धुन गूंज रही थी। मयंक अपनी ड्यूटी पर था, चेहरे पर वही शांत मुस्कान।
तभी होटल का दरवाज़ा ज़ोर से खुला। शनाया अपने अमीर दोस्तों के झुंड के साथ अंदर आई।
“वेटर!” उसकी आवाज़ किसी हुक्म की तरह थी।
मयंक तुरंत झुका: “जी मैडम, क्या चाहिए?”
“सबसे अच्छी टेबल, अभी! हमें इंतज़ार करना पसंद नहीं,” शनाया ने उंगलियाँ चटकाईं।
मयंक उन्हें वीआईपी टेबल तक ले गया और पानी भरने लगा। थकान के कारण उसका हाथ थोड़ा कांप गया और पानी की कुछ बूँदें टेबल पर छलक गईं। सिर्फ चंद बूँदें।
लेकिन शनाया का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
“ये क्या बदतमीज़ी है?” वह पूरी लॉबी में चिल्लाई। “तुम्हें इतना भी काम करना नहीं सिखाया? निकम्मे कहीं के!”
सारे मेहमान चौंक कर देखने लगे। मयंक ने तुरंत नैपकिन से टेबल साफ़ की। “माफ़ कीजिए मैडम, दोबारा नहीं होगा।”
लेकिन शनाया अपने दोस्तों के सामने तमाशा करना चाहती थी।
“तुम गरीब लोग कभी सुधर नहीं सकते! भीख की तरह काम करते हो!”
और फिर, सबके सामने, उसने मयंक के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
“चटाक!”
पूरी लॉबी में सन्नाटा छा गया। वायलिन रुक गया। मयंक वहीं खड़ा रह गया, उसका गाल जल रहा था, आँखों में आँसू थे। उसने अपने दोस्तों की हँसी सुनी। “गुड शॉट, शनाया!”
उसका दिल टूट गया। क्या गरीब होना गुनाह है? क्या मेहनत का कोई सम्मान नहीं? वह चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा। उसे अपनी माँ की चिंता थी, वह यह नौकरी नहीं खो सकता था।
उस रात उसने जैसे-तैसे अपनी ड्यूटी पूरी की। हर नज़र उसे चुभ रही थी। घर लौटकर, उसने पहली बार अपनी माँ को फोन पर रोते हुए सब बताया।
“बेटा,” माँ की कमज़ोर आवाज़ आई, “अपमान थप्पड़ में नहीं, उसका जवाब देने के तरीके में होता है। आज तुम चुप रहे, कल तुम्हारी सच्चाई उन्हें झुका देगी।”
मयंक ने आँसू पोंछे। उसने फैसला कर लिया था।
अध्याय 3: असली पहचान
अगली सुबह, द ग्रैंड सेरेनिटी के बाहर हज़ारों लोगों की भीड़ थी। मीडिया की वैन, कैमरे, पुलिस। सब हैरान थे कि अचानक क्या हो गया।
होटल स्टाफ कानाफूसी कर रहा था। रात वाली थप्पड़ की घटना किसी ने रिकॉर्ड कर ली थी।
शनाया भी अपने दोस्तों के साथ पहुँची। भीड़ देखकर वह हँसी, “लगता है कोई फिल्म स्टार आया है।”
“शनाया, देखो, सब रिपोर्टर हैं। कहीं यह रात वाले मामले की वजह से तो नहीं?”
“अरे डर मत,” शनाया ने अकड़ से कहा, “पैसे से सब चुप हो जाते हैं।”
तभी भीड़ में हलचल हुई। एक लंबी, काली रोल्स-रॉयस गाड़ी आकर रुकी। उसके पीछे दो और एसयूवी थीं। सूट-बूट पहने बॉडीगार्ड्स ने रास्ता बनाया।
और फिर कार से एक शख्स बाहर निकला।
वह मयंक था।
लेकिन यह कल रात वाला डरा-सहमा वेटर नहीं था। आज वह एक महंगे इटैलियन सूट में था, बाल सलीके से संवारे हुए, और आँखों में गज़ब का आत्मविश्वास।
भीड़ हैरान रह गई। “अरे! यह तो वही वेटर है!” “लेकिन यह रोल्स-रॉयस में क्या कर रहा है?”
शनाया का चेहरा पीला पड़ गया। “यह… यह यहाँ क्या कर रहा है?”
मीडिया मयंक की तरफ दौड़ा। “सर! क्या आप वही हैं जिन्हें कल रात थप्पड़ मारा गया था?”
मयंक ने माइक संभाला। “हाँ, मैं वही हूँ। कल रात आप सबने मुझे एक गरीब वेटर समझा। लेकिन आज मैं यहाँ अपनी असली पहचान के साथ खड़ा हूँ।”
शनाया कांपने लगी। उसके पिता, जो शहर के बड़े बिजनेसमैन थे, भी वहाँ पहुँच गए। मयंक को इस रूप में देखकर उनकी आँखें फटी रह गईं।
“कल,” मयंक की आवाज़ गूंजी, “मुझे इसलिए अपमानित किया गया क्योंकि मैं गरीब दिखता था। लेकिन आज मैं आपको सच बताता हूँ…”
उसने शनाया की आँखों में सीधे देखा।
“मैं मयंक ओबेरॉय हूँ, ओबेरॉय होटल ग्रुप के चेयरमैन का इकलौता बेटा और इस पूरी होटल चेन का वारिस!”
हॉल में जैसे बम फट गया। शनाया लड़खड़ा गई।
“मेरे पिता ने कहा था, मालिक बनने से पहले नौकर बनना सीखो। मैं यहाँ 2 साल से काम कर रहा था, ताकि अपने स्टाफ का दर्द समझ सकूँ। और कल रात मैंने सीखा कि दौलत का घमंड इंसान को कितना गिरा सकता है।”
तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
अध्याय 4: फैसला
शनाया और उसके पिता जड़ हो गए थे। पिता ने आगे बढ़कर बनावटी मुस्कान के साथ कहा, “बेटा मयंक, यह सब गलतफहमी है। शनाया बच्ची है…”
“बच्ची?” मयंक हँसा। “थप्पड़ का दर्द शायद मिट जाए, लेकिन ज़िल्लत का ज़ख्म नहीं भरता। और मैं आज इसका जवाब दूँगा।”
उसने अपने वकीलों की तरफ देखा। “मैं ऐलान करता हूँ कि ओबेरॉय ग्रुप आपकी कंपनी के साथ अपने सारे कॉन्ट्रैक्ट रद्द करता है। हम ऐसे लोगों के साथ बिजनेस नहीं करते जो इंसान की इज़्ज़त करना नहीं जानते।”
शनाया के पिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। यह उनके करियर पर सबसे बड़ा वार था।
शनाया रोती हुई मयंक के पास आई। “मुझे माफ़ कर दो! मयंक, मुझे नहीं पता था कि तुम…”
“तुम माफ़ी मेरी पहचान देखकर मांग रही हो, या अपनी गलती मानकर?” मयंक ने उसे रोका। “अगर आज भी मैं वही वेटर होता, तो क्या तुम माफ़ी मांगतीं?”
शनाया खामोश हो गई।
मयंक ने भीड़ की तरफ देखा और कहा, “याद रखिए, गरीबी कोई गुनाह नहीं है। मेहनत करने वाला कभी छोटा नहीं होता। लेकिन अहंकार… अहंकार हमेशा इंसान को गिरा देता है।”
उस दिन मयंक सिर्फ होटल का वारिस नहीं बना, वह हज़ारों कर्मचारियों की आवाज़ बन गया। और शनाया को अपनी दौलत का सबसे महंगा सबक मिल गया।