भूखा बच्चे ने रोटी मांगा था करोड़पति मैडम ने जो किया पूरी इंसानियत हिल गई

मुंबई, एक ऐसा शहर जो दिन में दौलत की चमक से चौंधियाता है और रात में अनगिनत गमों को अपनी आगोश में समेट लेता है। इसी शहर के सबसे आलीशान इलाके जूहू में समंदर के किनारे एक महल जैसा बंगला था, जिसे लोग ‘सोना महल’ कहते थे।

यह दुनिया थी आरती सिंघानिया की। एक ऐसी दुनिया जहाँ हवा भी इंपोर्टेड एसी से छनकर आती थी। हवेली की ऊँची दीवारें सिर्फ दौलत को नहीं, बल्कि बाहर की दुनिया के दर्द को भी अंदर आने से रोकती थीं। वह एक सुनहरी मछली थीं, जिसे अपने महंगे एक्वेरियम की सुंदरता के आगे समंदर के अस्तित्व का पता भी नहीं था।

लेकिन ठीक उसी सोने की दीवार के साये में, जहाँ आरती जी के डिजाइनर जूतों की ठोकर नहीं पहुँचती थी, वहाँ एक संकरी, बदबूदार गली थी। उस गली में गरीबी के टीलों पर पल रहा था गोलू, जिसकी उम्र सिर्फ आठ साल थी। उसका बचपन टूटी चप्पलों और फटे कपड़ों का एक कड़वा अध्याय था। उसका सबसे स्थायी साथी था पेट में जलता हुआ शूल – भूख की आग। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ घरों में बर्तन माँजती थी। गोलू का सपना बस इतना था कि एक दिन वह बिना पेट दबाए सीधा खड़ा हो सके।

एक जलती हुई दोपहर, जब सूरज आग उगल रहा था, गोलू घर के बाहर खेलने की कोशिश कर रहा था। सुबह से उसके पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं गया था।

अचानक, उसकी नाक से एक बेहद ललचाने वाली खुशबू टकराई। वो खुशबू हवेली की ऊँची दीवार के पार से आ रही थी। अंदर शायद कोई बहुत बड़ी दावत थी। पकवानों की उस जादुई महक ने गोलू की भूख को 100 गुना बढ़ा दिया। उसका नन्हा शरीर डगमगाने लगा। वह हवेली के मुख्य द्वार पर पहुँचा। बड़ा सा कलात्मक लोहे का गेट। उसके सामने खड़ा वह बच्चा उस विशाल और निर्दयी दौलत के आगे एक छोटी सी, असहाय बिंदी जैसा लग रहा था।

उसने कांपते हाथों से दरवाजे पर घंटी बजाई।

गार्ड ने दरवाजा खोला, उसकी आँखों में उपेक्षा थी।

“अंकल,” गोलू की आवाज़ कांप रही थी, “क्या… क्या मैं अंदर जाकर मैडम से मिल सकता हूँ? मुझे… मुझे सिर्फ एक रोटी चाहिए।”

“चल भाग यहाँ से!” गार्ड ने उसे ज़ोर से दुत्कार दिया। “यह कोई लंगर नहीं है! जा अपने बाप से मांग!”

गोलू रोने लगा। उसके रोने की आवाज़ अंदर शानदार लंच में खलल डाल रही थी। तभी अपने महंगे चश्मे और गुस्से से भरा चेहरा लिए आरती शर्मा बाहर आईं।

“यह क्या बकवास है? कौन है यह बच्चा? इतना शोर क्यों?”

“मैडम, यह गली का बच्चा है, खाने के लिए भीख मांग रहा है,” गार्ड ने सफाई दी।

गोलू ने अपनी सारी बची-खुची हिम्मत बटोरी। उसके छोटे हाथ श्रद्धा से जुड़ गए और नम आँखों से उसने आरती जी की ओर देखा। “मैडम, सुबह से मैंने कुछ नहीं खाया। मुझे पता है आपके यहाँ बहुत खाना है। क्या आप… क्या आप मुझे सिर्फ एक रोटी दे सकती हैं? सिर्फ एक रोटी।”

हवेली के आँगन में पल भर के लिए मौत सा सन्नाटा छा गया। कुछ अमीर मेहमान भी उत्सुकता से बाहर आ गए। यह उनके लिए एक मजेदार लाइव ड्रामा था।

आरती जी ने उस बच्चे को देखा। उसकी फटी शर्ट, धूल से सने गाल और उन आँखों में बसी गहरी, जानलेवा भूख। एक पल के लिए उनके भीतर की इंसानियत ने शायद उस सोने के पिंजरे को झकझोड़ने की कोशिश की होगी।

लेकिन अगले ही पल, उनके चेहरे पर दौलत का वही मोटा और निर्दयी अहंकार लौट आया।

आरती जी ने अत्यंत ठंडे और अपमानजनक लहजे में कहा, “एक रोटी? तुम्हें क्या लगता है यह हवेली लंगर है? हम तुम्हें खाना खिलाने के लिए नहीं बैठे हैं। जाओ यहाँ से। अगर मैं तुम जैसे हर गली के बच्चे को एक-एक रोटी देने लगी, तो हमारा क्या होगा? मेरी रोटियों का हिसाब कौन रखेगा?”

उन्होंने गार्ड की ओर देखा और एक अंतिम आदेश दिया, “इसे तुरंत बाहर फेंक दो! और हाँ, यह बच्चा आइंदा यहाँ नज़र नहीं आना चाहिए!”

गोलू की आँखों में एक रोटी की जो आखिरी उम्मीद थी, वह अब आँसुओं के रूप में बह निकली। वह बिना कुछ कहे, सिर झुकाए वापस मुड़ गया।

गोलू हवेली से मुश्किल से 50 कदम दूर पहुँचा होगा, अचानक भूख और कमजोरी के कारण उसका नन्हा शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह बेहोश हो चुका था।

पास से गुज़र रही एक बूढ़ी महिला ने शोर मचाया। लोग इकट्ठा हो गए। यह खबर हवेली के दरवाज़े तक पहुँची।

एक मेहमान ने कहा, “आरती जी, वह बच्चा सच में बेहोश हो गया है। कम से कम अपने डॉक्टर को तो भेज दीजिए।”

आरती जी तब भी अपने अहंकार में थीं। “यह सब ड्रामा है। भीख मांगने के नए तरीके।”

पर तभी उनके पति, मिस्टर शर्मा, जो अपनी ज़रूरी मीटिंग छोड़कर बाहर आए थे, ने यह सब सुना। उन्होंने गोलू को बेहोश देखा और पूरी बात सुनी। उन्हें लगा कि उनकी दौलत की ऊँची दीवारों के पीछे उनकी पत्नी की इंसानियत मर चुकी है।

मिस्टर शर्मा तुरंत गोलू के पास गए। उन्होंने बच्चे को गोद में उठाया और अपनी गाड़ी से सीधे अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने बताया कि गोलू की हालत सिर्फ और सिर्फ गंभीर कुपोषण और अत्यधिक भूख के कारण हुई थी।

मिस्टर शर्मा ने यह सुना तो उनका सिर शर्म से झुक गया।

जब मिस्टर शर्मा वापस हवेली पहुँचे, तो उन्होंने अपनी पत्नी आरती जी की ओर देखा जो अभी भी लंच के मेज पर बैठी थीं।

मिस्टर शर्मा ने बड़े शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा, “आरती, तुमने आज एक बच्चे को सिर्फ एक रोटी देने से मना कर दिया। उस एक रोटी की कीमत आज हमारी पूरी दौलत से भी ज्यादा हो गई है। तुमने उस बच्चे को नहीं, बल्कि अपनी इंसानियत को भूखा मार दिया।”

मिस्टर शर्मा ने उसी दिन एक ट्रस्ट बनाने की घोषणा की। इसका नाम रखा गया “एक रोटी का घर“। इस ट्रस्ट का मकसद था शहर के हर भूखे बच्चे को दिन में कम से कम एक बार पेट भर खाना देना। उन्होंने अपनी करोड़ों की संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस ट्रस्ट को दान कर दिया।

आरती जी स्तब्ध रह गईं। उनके पति ने उनकी दौलत से भरी दुनिया को सिर्फ झकझोरा नहीं, बल्कि तोड़ दिया था। गोलू की एक रोटी की गुजारिश ने मिस्टर शर्मा को यह एहसास दिला दिया था कि दौलत सिर्फ इमारतें खड़ी कर सकती है, इंसानियत नहीं।

उस रात आरती जी बहुत रोईं। अगले दिन से, उन्होंने खुद “एक रोटी का घर” में जाकर बच्चों के लिए खाना बनाना शुरू कर दिया। यह सिर्फ पश्चाताप नहीं था; यह उनकी इंसानियत का पुनर्जन्म था।

और वह बच्चा गोलू, आज “एक रोटी का घर” में हँसता-खेलता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि भूख का दर्द दौलत की चमक से कहीं ज्यादा गहरा होता है, और एक रोटी का मूल्य कभी-कभी करोड़ों की संपत्ति से भी अधिक हो सकता है।

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