अध्याय 1: किस्मत का टकराव
हैदराबाद शहर, जहाँ चमचमाती गगनचुम्बी इमारतें और बेतहाशा भीड़ है। लेकिन इसी चमक के नीचे, फुटपाथ पर एक दूसरी दुनिया बसती है। यह दुनिया 8 साल के आर्यन की थी। उसकी आँखें अपनी उम्र से ज़्यादा गहरी थीं, जिनमें भूख और बेबसी साफ झलकती थी। वह आने-जाने वालों के सामने अपना नन्हा, गंदा हाथ फैलाता, कुछ सिक्कों की उम्मीद में।
आर्यन हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी उसका भी एक छोटा सा घर था। पिता सत्यपाल दिहाड़ी मजदूर थे और माँ सुनीता सिलाई करती थीं। वे गरीब थे, लेकिन आर्यन को लेकर उनके सपने बहुत बड़े थे। “मेरा बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा,” सत्यपाल गर्व से कहते थे।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक रात एक तेज रफ्तार ट्रक ने आर्यन के माता-पिता को उससे छीन लिया। 5 साल का आर्यन अनाथ हो गया। कुछ दिन पड़ोसियों ने संभाला, लेकिन फिर सबने मुँह फेर लिया। आर्यन सड़क पर आ गया।
तीन साल बीत गए। फुटपाथ उसका घर बन गया और कूड़े के ढेर उसका निवाला।
एक तपती दोपहर, आर्यन भूख से बेहाल एक कोने में बैठा था। उसने देखा कि एक अमीर आदमी, सूट-बूट पहने, फोन पर ज़ोर-ज़ोर से बातें करता हुआ सड़क की तरफ बढ़ रहा है। वह अरविंद था, शहर का एक नामी उद्योगपति। वह अपने फोन में इतना मशगूल था कि उसे सड़क पर आती तेज रफ्तार कार का ध्यान ही नहीं रहा।
आर्यन ने कार को देखा। हॉर्न की आवाज़ आई, लेकिन अरविंद टस से मस नहीं हुआ।
आर्यन के ज़ेहन में अपने माता-पिता की दर्दनाक मौत का मंज़र कौंध गया। वह बिना सोचे चिल्लाया।
“साहब! गाड़ी!”
और अगले ही पल, उसने दौड़कर अरविंद को ज़ोर से धक्का दिया। दोनों फुटपाथ पर गिर पड़े और कार तेज़ी से गुज़र गई। अरविंद की ज़िंदगी बाल-बाल बची थी।
वह गुस्से में उस बच्चे को घूरने उठा जिसने उसे गिराया था, लेकिन जब उसने गुज़रती कार को देखा, तो उसके होश उड़ गए। उसका गुस्सा कृतज्ञता में बदल गया। उसने उस मैले-कुचैले बच्चे को देखा जिसने उसकी जान बचाई थी।
“बेटा… तुमने… तुमने मुझे बचाया,” अरविंद ने कांपती आवाज़ में कहा। “तुम्हें भूख लगी है?”
आर्यन ने सिर्फ सिर हिलाया।
अरविंद ने उसे खाना खिलाया। आर्यन जिस तरह हर निवाले को खा रहा था, अरविंद ने वैसा मंज़र पहले कभी नहीं देखा था। लाखों की दावतों में भी ऐसी तृप्ति नहीं देखी थी।
“साहब, अब मुझे जाना होगा,” आर्यन ने झिझकते हुए कहा।
“नहीं,” अरविंद ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया। “तुम मेरे साथ चलोगे।”
आर्यन डर गया, लेकिन अरविंद की आँखों में उसे एक अजीब सी सच्चाई दिखी। वह उस आलीशान कार में बैठ गया, यह जाने बिना कि उसकी दुनिया हमेशा के लिए बदलने वाली है।
अध्याय 2: नया परिवार और साज़िश
फ़ैमिली गेम
कार एक विशाल बंगले के सामने रुकी। अरविंद आर्यन को अंदर ले गया। उसकी पत्नी अनामिका हैरान रह गई।
“अरविंद, यह बच्चा कौन है?”
अरविंद ने उसे पूरी घटना बताई। “अनामिका, हमारी शादी को 12 साल हो गए, हमारी कोई औलाद नहीं है। शायद भगवान ने इसे हमारी ज़िंदगी बचाने और हमारी ज़िंदगी संवारने के लिए भेजा है। आज से यह हमारा बेटा है।”
अनामिका चौंक गई, लेकिन फिर उस मासूम बच्चे को देखकर उसका दिल पिघल गया। उसने आर्यन को गले लगा लिया। “घर आ गए बेटा।”
उस रात, तीन साल बाद पहली बार आर्यन एक नरम बिस्तर पर सोया।
लेकिन इस खबर ने अरविंद के छोटे भाई मनोहर के दिल में आग लगा दी। वह हमेशा अपने भाई की संपत्ति पर नज़र गड़ाए बैठा था, यह उम्मीद करते हुए कि उसका बेटा करण ही वारिस बनेगा।
“एक भिखारी… और वारिस?” मनोहर ने अपनी पत्नी से कहा। “यह नहीं हो सकता!”
“कुछ कीजिए,” पत्नी ने कान भरे। “क्या हमारा बेटा किसी सड़क छाप से हारेगा?”
उधर, आर्यन को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में दाखिला मिल गया। शुरू में बच्चों ने उसका मज़ाक उड़ाया, लेकिन आर्यन ने सब सहकर पढ़ाई में ध्यान लगाया। वह जानता था कि यह उसका एकमात्र मौका है।
आर्यन जितना आगे बढ़ता, मनोहर की नफरत उतनी ही गहरी होती। उसका अपना बेटा करण, बिगड़ैल और नशेड़ी था। यह फर्क मनोहर को और जलाता।
“भाई, तुम गलती कर रहे हो,” मनोहर ने अरविंद को समझाने की कोशिश की। “वह हमारा खून नहीं है। एक दिन वह तुम्हें धोखा देगा।”
“मनोहर, तुम गलत हो,” अरविंद ने दृढ़ता से कहा। “रिश्ते खून से नहीं, इंसानियत से बनते हैं। इस बच्चे ने मुझे ज़िंदगी दी है। यह मेरा बेटा है।”
झगड़े के बाद मनोहर ने अपने भाई से सारे रिश्ते तोड़ दिए।
अध्याय 3: कर्म का फल
समय का पहिया घूमा। करण की बुरी आदतों ने मनोहर के व्यापार को डुबो दिया। उस पर भारी कर्ज चढ़ गया और उसका बंगला नीलाम होने की कगार पर आ गया।
हताश होकर, मनोहर अपने बड़े भाई अरविंद के पास पहुँचा।
“भाई, मुझे बचा लो…” वह रो पड़ा। “मैं गलत था। मुझे माफ़ कर दो।”
अरविंद ने आर्यन को बुलाया, जो अब 20 साल का एक होनहार नौजवान बन चुका था। “आर्यन, यह तुम्हारे चाचा हैं। हमें इनकी मदद करनी चाहिए।”
आर्यन, जिसने अपने चाचा से सिर्फ नफरत देखी थी, मुस्कुराया। उसने मनोहर को उठाया: “चाचा जी, चिंता मत कीजिए। हम एक परिवार हैं।”
आर्यन की दरियादिली ने मनोहर को शर्मिंदा कर दिया।
अरविंद ने न सिर्फ मनोहर का सारा कर्ज चुकाया, बल्कि उसे अपने परिवार के साथ अपने बंगले में ले आया।
करण भी अब सुधरने लगा था। उसने अपने ‘भिखारी’ भाई को अपने पिता को बचाते हुए देखा था।
“आर्यन… मुझे माफ़ कर देना,” करण ने कहा।
“हम भाई हैं,” आर्यन ने उसे गले लगा लिया।
अरविंद ने करण को अपनी कंपनी में एक छोटी सी नौकरी दी, और आर्यन की मदद से करण ने भी मेहनत का मतलब सीखा।
जो परिवार लालच और ईर्ष्या से बिखर गया था, वह इंसानियत और माफी से फिर से जुड़ गया। आर्यन, वह अनाथ बच्चा, जिसे कोई नाम तक नहीं देना चाहता था, आज उस पूरे परिवार की जान बन गया था। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसानियत का रिश्ता खून के रिश्ते से भी बड़ा होता है।