अध्याय 1: भूली हुई यादें
अनंतपुर, धन और शक्ति के शहर में, वीर प्रताप एक राजा की तरह रहते थे। वह एक विशाल उद्योगपति थे, जिनके पास गगनचुम्बी इमारतें, आलीशान बंगले और बेहिसाब दौलत थी। उनका जीवन नौकर-चाकरों और मैनेजरों की फौज पर चलता था।
उनके परिवार में उनकी पत्नी मीनाक्षी और 18 वर्षीय बेटा रोहित था। रोहित ने जन्म से ही चांदी का चम्मच मुँह में लिया था, वह “संघर्ष” शब्द का अर्थ भी नहीं जानता था।
एक सुबह, वीर प्रताप अपने हरे-भरे बगीचे में बैठे चाय पी रहे थे। उन्होंने रोहित को अपने एक दोस्त के साथ हँसते-खेलते देखा। बेटे की वह खिलखिलाहट अचानक उनके दिल में दबी एक पुरानी याद को जगा गई। एक नाम उनके ज़ेहन में कौंधा: शंभू दास।
यह नाम एक चाबी की तरह था जिसने अतीत का दरवाजा खोल दिया। उन्हें वे दिन याद आ गए जब वे सिर्फ वीरू थे, शांतिपुरी गाँव के एक गरीब अनाथ। और शंभू… शंभू सिर्फ उनका दोस्त नहीं था, वह उनका बड़ा भाई, उनका सहारा, उनका परिवार था।
एक गहरे अफसोस और शर्मिंदगी ने उन्हें घेर लिया। 25 साल हो गए थे। 25 साल वह कामयाबी के नशे में उस इंसान को भूल गए थे जिसने उन्हें पाला था।
“मीनाक्षी!” उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा। “सामान पैक करो। हमें अभी शांतिपुरी निकलना है।”
मीनाक्षी हैरान थीं। “शांतिपुरी? इतनी अचानक?”
“मुझे शंभू दास से मिलना है,” उन्होंने दृढ़ता से कहा।
उन्होंने रोहित की तरफ देखा: “तुम भी चल रहे हो। तुम्हें एक बहुत खास इंसान से मिलवाना है।”
रोहित ने मुँह बनाया: “पापा, मुझे नहीं जाना। मेरी पार्टी है।”
“कोई पार्टी नहीं!” वीर प्रताप की आवाज़ सख्त हो गई। “तुम्हारा चलना ज़रूरी है। यह वह सबक है जो तुम्हें कोई स्कूल नहीं सिखा सकता।”
रोहित ने अपने पिता को इतना गंभीर पहले कभी नहीं देखा था। वह अनिच्छा से कार में बैठ गया। रास्ते में वे बैंक रुके। वीर प्रताप ने 10-12 लाख रुपये कैश से भरा एक सूटकेस निकाला।
“पापा! इतने सारे पैसे?” रोहित चौंक गया।
वीर प्रताप ने एक फीकी मुस्कान दी। “एक पुराना कर्ज चुकाना है, बेटा।”
“कर्ज? आप पर किसका कर्ज हो सकता है?” रोहित को विश्वास नहीं हुआ।
“बैठो और सुनो,” वीर प्रताप ने कहा, उनकी आँखें दूर अतीत में खोई थीं। “यह 25 साल पहले की कहानी है, जब मेरे पास कुछ भी नहीं था…”
अध्याय 2: एहसान का वो कर्ज़
वीर प्रताप ने बताना शुरू किया। उनकी आवाज़ गहरी थी, जो रोहित और मीनाक्षी को (जिन्हें कहानी पता थी) अतीत में ले गई।
“…तब मैं एक अनाथ था, जिसे गाँव वालों के टुकड़ों पर पलना पड़ा। लेकिन जिस इंसान ने मुझे सच में परिवार का प्यार दिया, वह था शंभू और उसकी पत्नी पार्वती। वे मुझे ‘वीरू’ कहकर पुकारते थे। वे खुद गरीब थे, दो बच्चों के साथ एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे, लेकिन उन्होंने कभी मुझे भूखा नहीं सोने दिया।”
“मैं बड़ा हुआ, कुछ करना चाहता था लेकिन मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं थी। तुम्हारी माँ से शादी हो गई, जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं। मैं हताश हो गया और मैंने अपनी बंजर पुश्तैनी ज़मीन बेचकर शहर जाने का फैसला किया।”
“मैं शंभू के पास गया। मैंने कहा, ‘भैया, मुझे 500 रुपये चाहिए। आप मेरी ज़मीन बिकवा दो’।”
“शंभू और पार्वती भाभी ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हो गया हूँ। ‘ज़मीन बेचेगा? बाप-दादा की निशानी? तू रुक, मैं कुछ करता हूँ’।”
“वे अंदर गए और जब लौटे, तो शंभू ने मेरी तरफ एक पोटली बढ़ाई: ‘ये ले 500 रुपये। जा अपनी ज़िंदगी बना’।”
“मैं चौंक गया। ‘भैया, इतने पैसे कहाँ से आए?’”
“शंभू हँसा: ‘यह कर्ज़ नहीं है, यह मेरा प्यार है। जा, और कामयाब होकर लौटना’।”
“लेकिन जब मैंने पार्वती भाभी की तरफ देखा, तो उनकी आँखें नम थीं। मेरे ज़ोर देने पर उन्होंने बताया: ‘वीरू, हमने अपनी शादी की आखिरी निशानी, मेरे सोने के कंगन गिरवी रख दिए हैं। जा बेटा, तेरा भविष्य ज़्यादा ज़रूरी है’।”
वीर प्रताप की आवाज़ भर्रा गई। रोहित खामोश बैठा था, वह अब समझने लगा था।
“…मैं वो 500 रुपये लेकर दिल्ली आ गया। मैंने जानवरों की तरह मेहनत की। मज़दूरी से लेकर छोटी दुकान तक, और फिर यह कंपनी खड़ी की। 25 साल… 25 साल मैं सफलता के नशे में इतना डूब गया कि मैं उन सोने के कंगनों को भूल गया। मैं अपने भाई को भूल गया।”
अध्याय 3: पुनर्मिलन
शानदार कार जब शांतिपुरी गाँव में घुसी, तो सब हैरान रह गए। वीर प्रताप उस पुरानी झोपड़ी के सामने खड़े थे। उनका दिल डूब गया। घर वैसा ही था, बल्कि और भी जर्जर हो चुका था। दीवारें टूटी थीं, छत उखड़ रही थी।
वह अंदर गए। शंभू और पार्वती एक पुरानी चारपाई पर बैठे थे। वे बहुत बूढ़े और कमज़ोर हो गए थे।
“माफ़ कीजियेगा… आप लोग किसे ढूँढ रहे हैं?” शंभू ने एक अमीर अजनबी को देखकर झिझकते हुए पूछा।
वीर प्रताप मुस्कुराए, अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए। “मैं यहाँ एक बहुत खास आदमी से मिलने आया हूँ।”
“यहाँ कोई खास नहीं है साहब, यह गरीबों का घर है,” शंभू ने कहा।
“नहीं भैया। मेरे लिए आप ही सबसे खास हैं। आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं वीरू हूँ!”
दोनों बूढ़े पति-पत्नी सन्न रह गए। “वीरू…?” शंभू ने नाम दोहराया। उन्होंने वीर प्रताप के चेहरे को गौर से देखा। वे आँखें, वह मुस्कान…
“अरे मेरे भाई! वीरू! तू ज़िंदा है?” शंभू ने दौड़कर उसे गले लगा लिया। दोनों दोस्त बच्चों की तरह रोने लगे। “तू कहाँ था इतने साल? मैं तो समझा तू हमें भूल गया!”
“मुझे माफ़ कर दो भैया… मैं भटक गया था, पर मैं कभी भूला नहीं,” वीर प्रताप ने सिसकते हुए कहा।
मीनाक्षी आगे बढ़ीं और चुपचाप शंभू और पार्वती के पैर छू लिए। गाँव वाले जो बाहर से झाँक रहे थे, वे हैरान रह गए। एक करोड़पति की पत्नी एक गरीब के पैर छू रही थी!
“अरे बहू, यह क्या कर रही हो?” पार्वती ने घबराकर मीनाक्षी को उठाया।
“भाभी,” मीनाक्षी ने भावुक होकर कहा, “अगर उस दिन आपने अपने कंगन न दिए होते, तो आज हम यहाँ न होते। हम ज़िंदगी भर आपके एहसानमंद रहेंगे।”
अध्याय 4: कर्ज़ चुकाना
माहौल थोड़ा शांत हुआ तो शंभू ने अपनी मुश्किलें बताईं। बेटा बड़ा हो गया, पर बेरोज़गार था, बेटी शादी के लायक थी, और खुद वह बीमार रहने लगे थे। गुज़ारा मुश्किल से हो रहा था।
तभी शंभू का बेटा काम से लौटा – एक दुबला-पतला नौजवान, पसीने में तर। वह घर में अजनबियों को देखकर ठिठक गया।
वीर प्रताप ने उसे प्यार से देखा। “बेटा, तुम क्या करते हो?”
“अंकल, मैं मज़दूरी करता हूँ। पर रात में सरकारी नौकरी की तैयारी भी करता हूँ,” लड़के ने स्वाभिमान से जवाब दिया।
वीर प्रताप की आँखें चमक उठीं। उन्होंने वह सूटकेस खोला।
“भैया शंभू, मैं वो 500 रुपये का कर्ज़ चुकाने आया हूँ। यह 10 लाख रुपये हैं, 25 साल का ब्याज।”
शंभू और पार्वती ने इतनी नकदी कभी नहीं देखी थी। वे कांप उठे।
“नहीं वीरू… यह कर्ज़ नहीं था…”
“आपको यह लेना होगा,” वीर प्रताप ने ज़ोर दिया। “और यह सब कुछ नहीं है।”
उन्होंने शंभू के बेटे से कहा: “कल से तुम मज़दूरी नहीं करोगे। तुम दिल्ली चलोगे और मेरी कंपनी में मैनेजर का काम संभालोगे। तुम्हारी बहन की शादी भी मैं कराऊँगा, धूमधाम से।”
वीर प्रताप ने अपने दोस्त का हाथ थामा: “भैया, आप दोनों भी मेरे साथ चलेंगे। आपने मुझे पाला था, अब मेरी बारी है।”
शंभू का पूरा परिवार रो रहा था। यह खुशी के आँसू थे।
रोहित, जो अब तक खामोश था, आगे बढ़ा और शंभू के बेटे को गले लगा लिया। “आज से हम भाई हैं।”
वीर प्रताप और शंभू दास की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची दौलत रिश्ते और एहसान होते हैं। सफलता की ऊँचाई पर पहुँचकर अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि वही हाथ जिन्होंने आपको गिरते हुए संभाला था, आपकी असली पूंजी हैं।